ग्राम पंचायतों को ग्राम प्रधानों के आतंक, अत्याचार और भ्रष्टाचार से बचाना है, इलेक्शन कमिश्नर की तरह ग्राम प्रधान के पद को त्रिसदस्यीय बनवाना है इसके लिये पूरे प्रदेश के ग्राम पंचायत सदस्यों एवम ग्राम प्रधान के चुनाव में हारे (रनर अप ) प्रत्यासियो को साथ मिलकर आन्दोलन चलाना है »

निम्नलिखित दो समस्यायें ग्राम पंचायतों के सुख चैन एवं भाई-चारे को गुटबन्दी एवं कलह का अखाड़ा बना रही हैं—
  1. प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के खिलाफ 51% सांसदों अथवा विधायकों के समर्थन के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है, लेकिन ग्राम प्रधानों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए 75% ग्राम पंचायत सदस्यों के समर्थन का प्रावधान क्यों रखा गया है? 75% ग्राम पंचायत सदस्यों के समर्थन के इस अतार्किक एवं कठिन प्रावधान के कारण ग्राम पंचायत सदस्य अविश्वास प्रस्ताव लाने में पूरी तरीके से असमर्थ एवं निरीह बना दिये गये हैं और ग्राम प्रधान को गांव का गुंडा बना दिया गया है। ग्राम पंचायत सदस्यों को अत्यधिक निरीह एवम कमजोर क्यों बनाया गया ? ग्राम पंचायत सदस्यों के अधिकारों में बढ़ोतरी से ग्राम प्रधानो की निरंकुशता में अंकुश लगेगा, अन्यथा निरंकुश होकर विकाश निधियो को भ्रस्टाचार की भेट ग्राम प्रधान चढाते रहेगे एवम गाव के भाईचारे को पछपात द्वारा नस्ट करते रहेगे
  2. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के खिलाफ कभी भी अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है, लेकिन ग्राम प्रधान के खिलाफ चुनाव के बाद दो सालों तक किसी भी परिस्थिति में अविश्वास प्रस्ताव कोई भी नहीं ला सकता है, चाहे ग्राम प्रधान कितना भी भ्रष्टाचारी एवं अकर्मण्य क्यों न हो और यदि चुनाव के दो वर्ष बाद अविश्वास प्रस्ताव कोई भी सदस्य लाता भी है और किसी कारण से उस निर्धारित दिन अविश्वास प्रस्ताव पास नहीं हो पाता है तो पुन: अगले दो वर्ष तक अविश्वास प्रस्ताव कोई भी किसी भी परिस्थिति में ला ही नहीं सकता है फिर चाहे ग्राम प्रधान सरकारी कर्मचारियों से मिलकर सम्पूर्ण विकास निधियों को भ्रष्टाचार की भेंट ही क्यों न चढ़ा रहा हो। इतना अतार्किक एवम अबौधिक कानून क्यु बनया गया है ? क्या ग्राम प्रधानो को गुटबंदी और भ्रस्टाचार का मसीहा बनाने के लिए |
  उपरोक्त दोनों अतार्किक, अबौद्धिक प्रावधानों के कारण ग्राम प्रधान न केवल अपने चुनावी विरोधियों को पूरे पाँच वर्ष तक पुलिस थाने, ब्लॉक एवं तहसील के कर्मचारियों से मिलकर परेशान करने में कोई कोर-कसर नहीं रखता है, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ चुनाव के समय ग्राम प्रधान के खिलाफ वोट देने वाले परिवारों तक न पहुँचे इसके लिए ग्राम प्रधान कर-बल-छल से प्रयास करता है। उपरोक्त दोनों अतार्किक प्रावधान ग्राम प्रधान को निरंकुश, दबंग और भ्रष्टाचार के द्वारा करोड़पति बनाने की गारंटी देती है। ग्राम प्रधान को अत्यधिक संरक्षण एवं प्रश्रय देने वाले इन दोनों अतार्किक एवं  निरंकुशनियमों को यथाशीघ्र बदलाव करने हेतु सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस प्रदेशव्यापी महाभियान में क्या आप मेरा साथ देंगे?साथ ही साथ गांवो को गुटबन्दी, भ्रष्टाचार से बचाने के लिए सरकार से यह मांग करते हैं कि ग्राम प्रधान के पद को सामंती प्रवृत्ति से बचाने के लिए त्रिसदस्यीय बनाया जाये। ठीक उसी तरह से जैसे भारत के राजनीतिज्ञों ने पूर्व चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन पर  यह आरोप लगाया था कि वे निरंकुश एवं तानाशाह के तरीके से चुनाव आयोग को चला रहे हैं, अत: ठीक उसके बाद सरकारों नेएक की जगह तीन चुनाव आयुक्त नियुक्त किये जाने की नई प्रथा शूरु कर दी।आज ग्राम प्रधान भी निरंकुश तरीके से काम करते है तो ग्राम प्रधान के पद को चुनाव आयोग की तरह त्रिसदस्यीय क्यों नहीं बनाया जा सकता है |   भारत ही नहीं पूरे विश्व में जब खेलों के परिणाम आते हैं तो जीतने वाले को स्वर्ण पदक एवं हारने वाले दो खिलाड़ियों को भी रजत एवं कांस्य पदक प्रदान किया जाता है यहाँ तक की ओलम्पिक के खेल में भी | इससे खेल भावना मजबूत होती है, क्योंकि यह मान लिया जाता है कि दो  हारने वाले खिलाड़ी भी जीतने वाले खिलाड़ी की तरह ही अच्छा खेले हैं लेकिन प्रथम तो किसी एक को ही आना है। ठीक इसी तरह से गांवों को गुटबंदी, भ्रष्टाचार एवं ग्राम प्रधानों के आतंक से बचाना है तो ग्राम प्रधान के चुनाव में दूसरे एवं तीसरे स्थान पर आने वाले प्रत्याशियों को भी ग्राम प्रधान मान लिया जाए अर्थात् ग्राम प्रधानके पद को चुनाव आयोग की तरह ही त्रिसदस्यीय बना दिया जाए और यदि अविश्वास प्रस्ताव द्वारा इन तीन ग्राम प्रधानों में से कोई ग्राम प्रधान अपने पद से हटा दिया जाता है तो ग्राम प्रधान के चुनाव में चौथे स्थान पर आये हुए प्रत्याशी को हटाये गये ग्राम प्रधान की जगह ग्राम प्रधान बनाया जाए। कोई भी निर्णय चुनाव आयोग की तरह ही तीनों ग्राम प्रधान बहुमत के आधार पर लें अर्थात् तीन में से दो ग्राम प्रधानों का समर्थन किसी भी कार्य हेतु अनिवार्य बनाया जाए।  

ग्राम पंचायतों में अभी भी यह प्रावधान है कि यदि कोई ग्राम प्रधान पद से हटा दिया जाता है तो उस ग्राम पंचायत के कार्यों को संचालित करने के लिए ग्राम पंचायत सदस्यों की त्रिसदस्यीय समिति बना दी जाती है तो यदि ऐसा प्रावधान सरकार त्रिसदस्यीय ग्राम प्रधान के पद के लिए कर देती है तो गांवो का न केवल भाई-चारा एवं सुख चैन बचा रहेगा, बल्कि आज की तरह ग्राम प्रधान जो दादागिरी एवं निरंकुश मानसिकता से सरकारी कर्मचारियों से मिलकर कमीशनखोरी करके विकास निधियों का बंदरबांट करते हैं वह भी पूरी तरीके से खत्म हो जायेगा।

 

धन्यवाद

राधेश्याम सिंह