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पीपुल्स मूवमेंट ऑफ इण्डिया (पी0एम0आई0) द्वारा शुरू किए गए नये लोकतंत्र के निर्माण के लिये राष्ट्रव्यापी-2019 की क्रान्ति का दस्तावेज

Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India

केवल एक संवैधानिक संशोधन से कश्मीर के आतंकवाद, लगभग 200 जिलों में फैले नक्सलवाद, उ0प्र0 के राज्यों में फैले उग्रवाद एवं अलगाववाद जातिवादी एवं साम्प्रदायिक दंगे सहित देश की सभी राजनीतिक समस्यायें धीरे-धीरे स्वतः ही समाप्त हो जायेंगी।

यह सिद्धानत अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा केंन्द्र सरकार एवं प्रदेशों के मंत्रिमंडल गठन को सदन विशेष की कुल संख्या के 15% तक सीमित रखने के संविधान संशोधन का ही विस्तारित रूप है, जिसके अनुसार लोकसभा अथवा विधानसभाओं की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक किसी भी परिस्थिति में मंत्री नहीं बनाये जा सकते हैं।

भारत की अधिकतर समस्याओं की जड़ निम्नलिखित पदाधिकारियों के चुनाव का निरंकुश, अराजक और असंवैधानिक तरीका है।

  • प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों का सांसदों एवं विधायकों द्वारा चुनाव नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा इलेक्शन के नाम पर सेलेक्शन होता है। यहीं से जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के नाम पर राजनीतिक पार्टियाँ मतदाताओं का ध्रुवीकरण करती हैं।
  • मेयर, नगर पालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्षों के चुनाव वोट बैंक को ध्यान में रखकर किसी प्रदेश में सभासदों की खरीद-फरोक्त से तो किसी प्रदेश में अमेरिका के राष्ट्रपतीय प्रणाली की तरह सीधे जनता के द्वारा चुनाव के नाम पर जाति और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तथा भ्रष्टाचार की गंगा बहाई जाती है।
  • पूरे भारत के लगभग सभी जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लाक प्रमुखों को ‘‘जिसकी लाठी उसकी भैंस” के आधार पर बैठाया और हटाया जाता है। सभी राजनीतिक पार्टियाँ धनपशुओं और बाहुबलियों को भ्रष्टाचार वाले धन से पार्टियों की रैलियाँ कराने का ठेका जैसे दे चुके हैं।


उपरोक्त पदाधिकारियों के चुनावों के अनियमित, अराजक एवं असंवैधानिक तरीके के कारण ही समाज के विभिन्न वर्गों एवं क्षेत्रों में असंतोष एवं आक्रोश पैदा होता है। जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर किसी को राजनीतिक रूप से उठाना एवं बहुतों को राजनीतिक रूप से दबाना और कुचलना वर्तमान राजनीति का पर्याय बन गया है। इन पदों के लिए होने वाले चुनावों का यह षड्यंत्रकारी तरीका विभिन्न राज्यों में दावानल बनकर भिन्न-भिनन रूपों में फूट रहा है। इसके कारण भारत के लगभग आधे प्रदेशों की सरकारें अराजकता एवं अनिश्चितता की सुनामी में गोते खा रही हैं।

क्या कोई बता सकता है कि भारत में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, मेयर, नगरपालिका अध्यक्षों, नगर पंचायत अध्यक्षों, जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लाक प्रमुखों के चुनावों में किस नियम का पालन होता है? प्रथम दृष्टया लगता होगा कि प्रधानमंत्री का चुनाव सांसद करते हैं और मुख्यमंत्रियों का चुनाव विधायक करते हैं, लेकिन ध्यान से सोचिए कि आजादी के 71 वर्षों में 90% से ज्यादा प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के चुनावों में सांसदों एवं विधायकों के ऊपर राजनीतिक पार्टियों ने वोट बैंक को ध्यान में रखकर अपनी मर्जी थोप दी हैं। जिसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकतर केन्द्र एवं राज्यों की सरकारें अनिश्चितता के भवंर में फंसी रही हैं। कभी अमेरिकी राष्ट्रपतीय प्रणाली की तरह सांसदों के चुनाव के पहले ही प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशियों की घोषणा और विधायकों के चुनाव के पहले मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों की घोषणा की जाती रही है। भारतीय गणतंत्र में व्याप्त यह कुप्रथा वास्तव में अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है।

उपरोक्त सभी समस्याओं के समाधान के लिए ही Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India  नामक सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। उपरोक्त सभी समस्याओं के समाधान के लिए ही Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India  नामक सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है।  Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India  के अनुसार केंन्द्र अथवा किसी प्रदेश में चाहे पार्टीविशेष की पूर्ण बहुमत की सरकार बने अथवा गठबंधन की सरकार बने। सरकार बनाने में शामिल सभी सांसदों अथवा विधायकों में से जनरल इलेक्शन (आम चुनाव) में सबसे अधिक वोट प्रतिशत पाकर चुनाव जीतकर आये 15% सांसदों को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी एवं प्रदेशों के सन्दर्भ में 15% सबसे अधिक वोट प्रतिशत से जीतने वाले विधायकों को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया जाये। इसके बाद पार्टीविशेष अथवा गठबंधन के शेष 85% सांसद अथवा विधायक उन 15% प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों के लिए वोट करें। इसके बाद 15% सबसे अधिक वोट प्रतिशत पाकर प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बने जिस सांसद अथवा विधायक को 85% सांसदों अथवा विधायकों का सबसे ज्यादा समर्थन प्राप्त हो जाये उसे ही प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाना चाहिए। यहाँ पुनः मैं स्पष्ट कर दूं कि आम चुनाव में सबसे अधिक वोट प्रतिशत पाकर चुनाव जीते हों नाकि सबसे ज्यादा वोट पाकर।

उदाहरण स्वरूप बी0जे0पी0 के 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 282 सांसद चुनकर आये थे तो इस स्थिति में प्रधानमंत्री पद हेतु बी0जे0पी0 के 282 सांसदों का 15% अर्थात् 42 भाजपा के वे सांसद जो सबसे अधिक मत प्रतिशत पाकर चुनाव जीते हों, वे प्रधानमंत्री पद के चुनाव हेतु प्रत्याशी बनते। इसके बाद बी0जे0पी0 के सबसे अधिक वोट प्रतिशत पाकर जनरल इलेक्शन जीते प्रधानमंत्री पद के इन 15% सांसदों के लिए 282-42=240 बी0जे0पी0 के सांसद वोट करते। प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनें इन 42 सांसदों में से जिस सांसद को सबसे ज्यादा बी0जे0पी0 के शेष 240 सांसदों का वोट मिलता, उस सांसद को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई जानी चाहिए थी।

इसी तरह से कर्नाटक में कांग्रेस और जनता-दल (सेक्युलर) गठबंधन के कुल विधायकों में से सबसे अधिक वोट प्रतिशत पाकर जीते 15% विधायकों के बीच से Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India के अनुसार मुख्यमंत्री चुना जाना चाहिए था, फिर वह चाहे कांग्रेस का कोई विधायक मुख्यमंत्री बनता या फिर जनता-दल (सेक्युलर) का। इससे ना केवल सरकार में स्थिरता आती बल्कि सत्ता संघर्ष की जगह कर्नाटक के विकास पर विधायकों एवं सरकार का ध्यान केन्द्रित होता।

यदि इस सिद्धान्त के अनुसार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों का चुनाव होता तो व्यक्तिवाद, परिवारवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद इत्यादि सभी बुराइयां भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए अप्रसांगिक हो जाती। वर्तमान समय में प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों के चयन की प्रक्रिया पूरी तरह से अलोकतांत्रिक, असंसदीय, स्वछंदतापूर्ण और पार्टियों का हितसाधक तथा देश के लोकतांत्रिक भावना तहस-नहस करने वाला है।

ठीक इसी तरह से मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख का चुनाव Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India के अनुसार होना चाहिए। यदि नगरीय अथवा ग्रामीण स्थानीय निकाय के किसी भी सदन विशेष के चुनाव पार्टी आधार पर ना हुए हों, तो वहां सदनविशेष के सबसे अधिक वोट प्रतिशत पाकर चुनाव जीते 15% सदस्यों के लिए शेष 85% सदन विशेष के शेष सदस्य वोट करें और 15% प्रत्याशी में से जिस प्रत्याशी को 85% वोट देने वाले शेष सदस्यों का सबसे अधिक समर्थन मिल जाये, उसे मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख बनाया जाना चाहिए।

क्या हमारे संविधान निर्माता अमेरिका की तरह राष्ट्रपतीय प्रणाली नहीं अपना सकते थे? लेकिन संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच समझकर उपरोक्त पदाधिकारियों के चुनाव में समाज के विभिन्न वर्गों एवं क्षेत्रों की आवाज को शामिल कराने के लिए ही लोकतंत्र की अमेरिका जैसे राष्ट्रपतीय प्रणाली की जगह संसदीय लोकतंत्र को अपनाया था। लेकिन आजादी के 71 वर्षों में राजनीतिक पार्टियों ने संविधान की मूल भावना को कुचलकर रख दिया है? हास्यास्पद तो यह है कि भारत की सभी राजनीतिक समस्याओं की इस जड़ पर ना तो कोई बात करता है और ना ही करना चाहता है। राजनीतिक पार्टियाँ निरंकुश तरीके से भारतीय लोकतंत्र को शतरंजी मुहरों की तरह नचा रही हैं।

Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India के अनुसार संवैधानिक संशोधन निम्नलिखित समस्याओं के समाधान के लिए होना चाहिए।

1. प्रधानमंत्री का चुनाव लोकसभा के आम चुनावों के बाद सांसदों द्वारा होना चाहिए नाकि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा होनी चाहिए। प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी को चुनाव के पहले घोषित करने से चुनाव मुद्दों पर आधारित ना होकर व्यक्ति आधारित बन जाता है। व्यक्ति आधारित चुनाव के परिणाम स्वरूप जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण होता है। यह व्यक्तिवादी चुनाव ही भारतीय लोकतंत्र की लगभग सभी समस्याओं की जड़ है। आजादी के 71 वर्षों में ऐसे-ऐसे व्यक्ति प्रधानमंत्री बने जिनकों देश चलाने की योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि सत्तासुख और लूटखसोट की सहूलियत को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री पद पर बैठाया और हटाया गया। यह भारतीय लोकतंत्र के साथ क्रूर मजाक है। राजनीतिक पार्टियों द्वारा थोपी गयी यह सामंती कुप्रथा भारतीय गणतंत्र का कैंसर बन गयी है।

2. मुख्यमंत्रीयों का चुनाव विधानसभा के चुनावों के बाद विधायकों द्वारा होना चाहिए। आजाद भारत में ऐसे-2 मुख्यमंत्री वोट बैंक को ध्यान में रखकर जनता पर थोप दिये गये, जो अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को भी नहीं पहचान पाते थे। सोचिये ऐसे मुख्यमंत्री प्रदेश की समस्याओं को कैसे पहचान पाते रहे होंगे। मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त है तो कोई पारिवारिक विरासत समझकर प्रदेश को चला रहा है। सब मिलकर देश को लूट रहे हैं। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की जो आग 90 के दशक में लगी उसमें मुख्यमंत्री चुनने एवं हटाने की अराजकता एवं स्वच्छंदता सबसे बड़ा कारण रही है। आजाद भारत में मुख्यमंत्री के पद के चुनाव की प्रक्रिया को कठपुतली बनाकर रख दिया गया है। राज्य की समस्याओं को हल करने की योग्यता हो या ना हो, पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए जातीय एवं साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की योग्यता राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकता बन गई है।

3. मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव शहरी निकायों में सभासदों के चुनाव के बाद खरीद-फरोख्त के बिना एक नियम के तहत सभासदों के द्वारा होना चाहिए। लेकिन किसी प्रान्त में मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष और नगरपंचायत अध्यक्ष सभासदों द्वारा चुने जाने के नाम पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा धनबल, बाहुबल एवं सरकारी बल से ‘‘कठपुतली” जैसे बैठा दिये जाते हैं तो किसी प्रान्त में अमेरिकी राष्ट्रपतीय प्रणाली की तरह जनता द्वारा सीधे चुने जाते हैं। प्राथमिकता केवल वोट बैंक बनाने की होती है। यहाँ भी चुनावों में राजनीतिज्ञों की स्वच्छंद एवं अराजक सोच के कारण बड़ी-बड़ी समस्याओं के समाधान को तो छोड़िये, शहरों के कूड़ा-करकट के निस्तारण की समझ भी इनको नहीं होती है। सब कुछ कमीशनखोरी और वोट बैंक के इर्द-गिर्द सिमटा होता है।

4. जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जिलापंचायत सदस्यों और ब्लाक प्रमुख का चुनाव बी0डी0सी0 द्वारा खरीद-फरोख्त के बिना एक नियम के तहत होना चाहिए। लेकिन होता क्या है? पूरे भारत में जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लाक प्रमुखों के चुनाव में एक ही नियम लागू होता है ‘‘जिसकी लाठी उसकी भैंस” राजनीतिक पार्टियाँ इन पदों पर कर-बल-छल से ऐसे लोगों को बैठाती रहीं है जो इन निकायों में भ्रष्टाचार करके बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियों की व्यवस्था कर सकें। वर्तमान व्यवस्था में पाँच साल तक ब्लाक प्रमुख के पद पर बैठने वाला कोई भी व्यक्ति इतना ज्यादा भ्रष्टाचार का धन इकट्ठा कर लेता है कि वह विधानसभा का टिकट खरीदकर चुनाव लड़ सकें एवं जिला पंचायत अध्यक्ष भ्रष्टाचार के द्वारा इकट्ठा किये हुए धन से लोकसभा का टिकट खरीदकर चुनाव लड़ सकें। क्या गांधी जी ने इसी तरह की अराजकता एवं लूटपाट वाली पंचायतीराज प्रणाली का सपना देखा था?

अतः Radheyshyam Singh’s 1st Doctrine for Advance Democracy in India में भारत की कोई भी राजनीतिक समस्या रख दीजिए गणित की तरह ठोंस समाधान मिल जायेगा। इस सिद्धान्त का सार ;ब्तनगद्ध चुनाव जीतने मात्र के लिए आवश्यक वोट जुटाने की प्रत्याशा में मतदाताओं के ध्रुवीकरण एवं जोड़-तोड़ के स्थान पर अधिकतम मतदाताओं के समर्थन से मैक्सिमम वोट परसेन्टेज (अधिकतम वोट प्रतिशत) लेकर चुनाव जीतने के दर्शन को भारतीय लोकतंत्र के चुनावी परिदृश्य में स्थापित कराना है।

वर्तमान समय की चुनावी प्रक्रिया में सांसद से लेकर सभासद, सरपंच तक का चुनाव लड़ने वाले केवल और केवल उतने वोट का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं, जिससे कि वे किसी भी तरह से चुनाव जीत सकें। चुनाव जीतने भर के लिए वोट पाने की इसी कुप्रथा के कारण वोट बैंक रूपी राक्षस पैदा किया जाता है, इस वोट बैंक रूपी राक्षस को खाद पानी जाति, सम्प्रदाय के ध्रवीकरण से मिलती है, जो कि भारतीय लोकतंत्र को दिन प्रतिदिन कमजोर कर रहा है। एक यूनानी कहावत है मछली सबसे पहले सिर की तरफ से सड़ना शुरू होती है। दुर्भाग्यवश भारत की राजनीति राजनेताओं के पद एवं धनलोलुपता के कारण सड़ रही है क्योंकि राजनेताओं के लिए देश नहीं पार्टियों के हित ज्यादा महत्वपूर्ण है।

भारतीय लोकतंत्र में इस सिद्धांत को स्थापित कराने में आपने साथ दिया तो कश्मीर में ‘‘आतंकवाद” की समस्या, नक्सलवाद की समस्या, जातीय एवं साम्प्रदायिक हिंसा, उत्तर-पूर्वी राज्यों के जातीय संघर्ष, अलगाववाद एवं उग्रवाद, हत्या, बलात्कार, अपहरण, लूट इत्यादि अपराधों में तुरन्त ही विराम लग जायेगा। साथ ही सुरक्षा बलों की शहादत में भी भारी कमी आ जायेगी। इस सिद्धान्त के निम्नलिखित लाभ तुरन्त दिखेंगे-

1. इस सिद्धान्त के अनुसार चुनाव होने से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख पद पर किसी की बपौती नहीं रह जायेगी। क्योंकि ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख पद के चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए 15% अधिकतम वोट प्रतिशत पाना आम चुनावों में अनिवार्य हो जायेगा, जिससे सांसद से लेकर सभासद तक के प्रत्याशियों में उपरोक्त पद पाने की लालसा में अधिक से अधिक मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए जनसरोकारों को हल करने और जनता के बीच हमेशा बने रहने के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जायेगी। 1. इस सिद्धान्त के अनुसार चुनाव होने से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख पद पर किसी की बपौती नहीं रह जायेगी। क्योंकि ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मेयर, नगर महापालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख पद के चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए 15% अधिकतम वोट प्रतिशत पाना आम चुनावों में अनिवार्य हो जायेगा, जिससे सांसद से लेकर सभासद तक के प्रत्याशियों में उपरोक्त पद पाने की लालसा में अधिक से अधिक मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए जनसरोकारों को हल करने और जनता के बीच हमेशा बने रहने के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जायेगी।

2. कश्मीर में फैले आतंकवाद पर विराम लग जायेगा। प्रथमदृष्टया यह दावा हवा हवाई लग रहा होगा लेकिन मानव इतिहास में जब भी बड़े समाधान आये हैं तो आश्चर्य एवं आशंकाएं आना स्वाभाविक हैं, लेकिन देखिए ना 1980 के दशक के उत्तरार्ध, जब से कश्मीर घाटी में आतंकवाद की बाढ़ जेसे आ गयी है, जिसमें लाखों सैनिक और नागरिक कालकवलित हो गये हैं। क्या कश्मीर के आतंकवाद के समाधान पर भारत सरकार एक भी इंच आगे बढ़ पायी है? कश्मीर में फैले आतंकवादी वातावरण में जो चीज सबसे कम चर्चा एवं विचार का विषय बनती है और जो सबसे ज्यादा खतरनाक है वह है वहाँ की आन्तरिक और चुनावी राजनीति। जब आप बहुत गहराई में जाकर सोचेंगे तो पायेंगे कि देश के अन्य हिस्सों की तरह ही कश्मीर में राजनीतिक पार्टियों की घिनौनी कार्य संस्कृति और वोट बैंक के लिए असामाजिक तत्वों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति आतंकवाद के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। देश के अन्य हिस्सों की राजनीतिक पार्टियों की तरह ही जम्मू कश्मीर की राजनीतिक पार्टियाँ भी अपने-अपने पार्टी काडर ;ब्ंकतमद्ध को राष्ट्रहित के लिए नहीं बल्कि पार्टी हित के लिए रैडिकलाइज (कट्टर) करती हैं।

3. इस सिद्धान्त के संविधान का हिस्सा बन जाने के बाद देश के लगभग 4000 विधायकों में मुख्यमंत्री, 543 लोकसभा सदस्यों में प्रधानमंत्री तथा लाखों सभासदों में मेयर, नगर पालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्यों में जिला पंचायत अध्यक्ष एवं बी0डी0सी0 में ब्लाक प्रमुख बनने की भूख पैदा हो जायेगी। परिणाम स्वरूप सभी जनपतिनिधि अपने-अपने चुनावी क्षेत्रों में साम्प्रदायिक एवं जातिगत फिरकापरस्ती नहीं बल्कि आमजन की समस्याओं के समाधान के प्रति हमेशा तत्पर रहने के लिए मजबूर हो जायेंगे। इससे भारतीय लोकतंत्र में गत्यात्मकता एवं रचनात्मकता आ जायेगी। नकारात्मक, व्यक्तिवादी, जातिवादी एवं साम्प्रदायिक राजनीति का पराभाव हो जायेगा।

4. भारत के किसी कोने में, कभी भी, एक भी जातिवादी एवं साम्प्रदायिक दंगे नहीं होंगे। भारतीय समाज बहुत विविधतापूर्ण है इसलिए व्यक्तिगत झगड़े तो सम्भव हैं लेकिन इस सिद्धांत के लागू होने के बाद भारत में व्यक्तिगत झगड़े जातिवादी एवं साम्प्रदायिक दंगे का रूप नहीं ले सकेंगे।

5. सांसद अथवा विधायक पद का कोई भी प्रत्याशी जातीय एवं साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से वोट बैंक को आधार बनाकर चुनाव नहीं जीतना चाहेगा बल्कि इस सिद्धान्त के लागू होने से अधिक से अधिक वर्गों, जातीय समूहों, सम्प्रदायों के अधिक से अधिक मतदाताओं का मत कोई भी प्रत्याशी पाना चाहेगा। अतः इस सिद्धांत के लागू होने के बाद वोट बैंक की राजनीति भारतीय लोकतंत्र में अप्रासंगिक हो जायेगी।

6. उत्तर-पूर्व के राज्यों में फैली अलगाववाद, उग्रवाद एवं जातीय हिंसा में विराम लग जायेगा। सांसद से लेकर सभासद तक के पद का हर प्रत्याशी अधिक से अधिक वर्गों, जातीय समूहों के मतदाताओं का मत पाने के लिए सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने में जी-जान से जुट जायेंगे।

7. लगभग 200 जिलों के विकास को अपने दुष्चक्र में फांस चुके नक्सलवाद का भी सफाया हो जायेगा। नक्सलवादी क्षेत्र में समस्या केवल नक्सलवादियों द्वारा नहीं खड़ी की जा रही है। नक्सलवादियों की आड़ में बहुत सारे सफेदपोश राजनेताओं, खनन माफियाओं, जंगल की लकड़ी काटने वाले बड़े-बड़े लकड़ी माफियाओं का नक्सलवादियों को समर्थन, नक्सलवाद को बढ़ाने में कम जिम्मेदार नहीं हैं। बहुत से राजनेता नक्सलवादियों के साथ सहअस्तित्व के आधार पर नेतागीरी कर रहे हैं, जिसके कारण नक्सलवादियों का नेक्सस तोड़ना सुरक्षा बलों के लिए और अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण हो जाता है। देश का एक भी जिला, प्रांत बताइए जहाँ अन्तर्राज्यीय माफियाओं का आतंक न फैला हो। यहाँ तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी हर मोहल्ले में बड़े-बड़े गुन्डों एवं माफियाओं का आतंक है फिर नक्सलवादी क्षेत्र तो तस्करों का अभयारण्य कई दशकों से बना हुआ है।

8. इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद भ्रष्टाचार जड़ से उखड़ जायेगा फिर वह चाहे व्यक्तिगत भ्रष्टाचार हो या संगठित भ्रष्टाचार हो। क्योंकि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण यह है कि भ्रष्टाचार रूपी खाद-पानी से ही राजनीति रूपी फसल उगती और लहलहाती है।

9. जातीय, साम्प्रदायिक, भाषाई क्षेत्रीय इत्यादि किसी भी तरह के अल्पसंख्यक होने पर भी देश के किसी भी कोने में किसी के प्रति भी होने वाले अन्याय एवं अत्याचारों में पूर्ण विराम लग जायेगा। यदि यह सिद्धान्त पहले होता तो कश्मीरी पण्डित कश्मीर से विस्थापित नहीं हुए होते। वर्तमान समय में मेघालय की राजधानी शिलांग में सिख समुदाय को वहाँ से भगाने का जो अभियान चल रहा है, वह या तो होता ही नहीं या फिर स्वतः ही रूक जाता।

10. शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा की स्थितियों में गुणात्मक एवं अविश्वसनीय परिवर्तन आयेंगे, क्योंकि इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद जन सरोकारों के मुद्दों का समाधान राजनेताओं की प्राथमिकता बन जायेगी।

11. किसान आत्महत्या नहीं करेंगे, 20 करोड़ भारतीय जो भूखे सोते हैं वह भी भूखे और तिरस्कृत नहीं रहेंगे, क्योंकि इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद आम जनता के हक एवं अधिकारों को छीनना नेताओं के लिए बहुत ही कठिन एवं राजनीतिक रूप से घाटे का सौदा हो जायेगा।

12. सरकारी तंत्र की जनता के प्रति असंवेदनशीलता और कार्य के प्रति लापरवाही भी इतिहास का विषय बन जायेगी, क्योंकि इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद जन समस्याओं के समाधान के लिए नेता अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर दबाव बनायेंगे न कि दलाली करेंगे।

13. सामाजिक भेदभाव, ऊँच-नीच एवं अमीरों का गरीबों के प्रति उपेक्षा के भाव भाईचारे में बदल जायेंगे, क्योंकि इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद अधिक से अधिक मतदाताओं से जुड़ने के लिए जनप्रतिनिधि आमजन के बीच रहना एवं उनके ही जैसे दिखना चाहेगा।

14. राजनीति से व्यक्तिवाद, परिवारवाद, जातिवाद एवं सम्प्रदायवाद बिल्कुल खत्म हो जायेगा, क्योंकि इनके कारण चुनाव जीतना असम्भव हो जायेगा। आज की राजनीति में ये सभी फैक्टर इसलिए प्रभावी एवं प्रासंगिक हैं क्योंकि वोट बैंक के आधार पर चुनाव जीतने की परम्परा जैसे बन गयी है।

15. राजनीति से बाहुबल एवं धनबल की संस्कृति इतिहास का विषय बन जायेगी, क्योंकि इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद ये सभी फैक्टर राजनीति में शर्म एवं तिरस्कार के विषय बन जायेंगे।

16. राजनीति को व्यापार बनाने वाले राजनीति में अप्रसांगिक हो जायेंगे, क्योंकि इस सिद्धान्त के लागू होने के बाद चुनाव जीतने के लिए आज की तरह असीमित धन नहीं बल्कि सीमित संसाधनों से ही काम चल जायेगा।

17. सरकारी ठेकों की लूट नेताओं, अधिकारियों एवं ठेकेदारों द्वारा मिलीभगत करके नहीं की जा सकेगी, क्योंकि आज जनसामान्य सब कुछ जानते हुए भी कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वोट बैंक की राजनीति में चुनाव जीतने भर के लिए वोट की जरूरत पड़ती है। सभी मतदाताओं की समस्याएं राजनेताओं के सरोकार के विषय नहीं बल्कि केवल वोट बैंक ही इनके लिए मायने रखती हैं।

18. पुलिस थाने डर भय के नहीं बल्कि सम्मान एवं सहयोग के केन्द्र बन जायेंगे, क्योंकि पुलिस के भ्रष्टाचार एवं नेताओं के भ्रष्टाचार एक दूसरे के पूरक एवं पोषक हैं। 19. गुणवत्तापरक शिक्षा के अभाव की समस्या भी खत्म होगी। सरकारें संवेदनशीलता के साथ शिक्षा के क्षेत्र की कमियों को दूर करेंगी। आज नेताओं ने शिक्षा को अपनी आय का साधन बना लिया है। छात्रों, युवाओं से डिग्री के नाम पर पैसे लूटकर ये राजनेता राजनीति की ऊँची-ऊँची सीढ़ी बनाते और चढ़ते हैं।

20. जिले से लेकर ग्राम पंचायत तक के अधिकारी, कर्मचारी जनता के शोषक नहीं सेवादार एवं सहयोगी बनकर कार्य करेंगे, क्योंकि आज की तरह केवल चुनावों के समय ही नेता जनता के बीच नहीं जायेंगे बल्कि सबके साथ रहकर इन घाघ एवं दोहरे चरित्र के अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर जनता के कार्य करने का दबाव बनायेंगे।

21. राजनीति में विधायकों, सांसदों, सभासदों, जिला पंचायत सदस्यों, बी0डी0सी0 की खरीद-फरोख्त इतिहास का विषय बन जायेगी, क्योंकि प्रधानमंत्री से लेकर ब्लाक प्रमुख तक के पद कुछ लोगों की बपौती नहीं रह जायेंगे बल्कि 15 प्रतिशत अधिकतम वोट प्रतिशत पाकर जीते जनप्रतिनिधि ही इन पदों के चुनाव में प्रत्याशी बन सकेंगे।

22. सांसद, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि जनसामान्य से जहाँपनाहों की तरह नहीं बल्कि जन प्रतिनिधियों की तरह व्यवहार करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से कुछ मतदाताओं का जातीय एवं साम्प्रदायिक वोट बैंक का समर्थन तो मिल सकता है, लेकिन अधिकतर मतदाता ऐसे राजनेताओं से विरोध एवं घृणा करेंगे।

23. बड़ी-बड़ी रैलियां नहीं बल्कि वैचारिक गोष्ठियां आयोजित करना राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकता एवं मजबूरी हो जायेगी और इस परिस्थिति में राजनेता चिल्लाने को नहीं बल्कि चिंतन को महत्व देने लगेंगे। हेलीकाप्टरों एवं हवाई जहाजों के बड़े-बड़े कारवां राजनीति के क्षेत्र में शर्म एवं तिरस्कार के विषय बन जायेंगे। वी0आई0पी0 कल्चर घृणा का विषय बन जायेगी।

24. जाति एवं सम्प्रदाय के आधार पर चुनाव के समय होने वाली ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति खत्म हो जायेगी। क्योंकि चुनाव जीतने भर के लिए नहीं अपितु प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री से लेकर ब्लाक प्रमुख तक के पद के चुनाव का प्रत्याशी बनने के लिए अधिकतम वोट प्रतिशत पाकर आम चुनाव जीतना सभी प्रत्याशियों की मजबूरी बन जायेगी।

25. चुनाव के समय किये जाने वाले झूठे वादे, शराब और मुफ्त की चीजें बांटकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कुप्रथा भारतीय चुनावी राजनीति से हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी। चुनाव लड़ने वालों की वैचारिक एवं चारित्रिक सुचिता एवं पारदर्शिता चुनाव जीतने की कसौटी और चुनौती बन जायेगी।

26. लोकतंत्र में तंत्र नहीं बल्कि लोक सम्मानित होगा। आज तंत्र इसलिए प्रभावी एवं शोषक है क्योंकि आज की राजनीति भ्रष्टाचार एवं कदाचार की पर्याय एवं बांदी बन चुकी है।

धन्यवाद राधेश्याम सिंह
अध्यक्ष
पीपुल्स मूवमेंट ऑफ इण्डिया
135Y/1Z/U वार्ड नं0 19, विष्णुपुरी
पोंगहट, इलाहाबाद, उ0प्र0-211012
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