पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) का प्रथम घोषणा-पत्र [Part 3] »

राष्ट्रीय से लेकर राज्य स्तरीय सभी राजनीतिक पार्टियों में सैकड़ो लोग ऐसे होते हैं जो चुनाव लड़ना चाहते हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियाँ तमाम असामाजिक एवं अलोकतांत्रिक कदम उठाते हुए धनबल, बाहुबल, जाति अथवा सम्प्रदाय इत्यादि का जोड़-घटाना करके वोटों का सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण कर पाने का तिकड़म कर पाने वाले व्यक्ति को टिकट दे देती हैं। फिर वह व्यक्ति चाहे अपराधी हो या अन्य असामाजिक और अलोकतांत्रिक क्रियाकलापों में आकण्ठ डूबा हो। यदि सभी राजनीतिक पार्टियाँ लोकसभा अथवा विधानसभा के चुनाव लड़ने के आकांक्षी अपने कार्यकर्ताओं से प्रार्थनापत्र लेने के बाद लाटरी प्रणाली के द्वारा प्रत्याशी के चयन की प्रक्रिया को सम्पन्न करें, तो इस प्रक्रिया से सभी राजनीतिक पार्टियांें के कार्यकर्ताओं में चाटुकारिता एवं हीन भावना से मुक्त होकर स्वाभिमान एवं पूर्ण उत्साह के साथ कार्य करने का हौसला पनपेगा। हाँ, प्रत्याशियों के लिए एक माॅडल कोड आफ कण्डक्ट होना चाहिए जैसे- प्रत्याशिता की आकांक्षा रखने वाले कार्यकर्ता अपराधी और भ्रष्टाचारी न हों तथा असामाजिक गतिविधियों में लिप्त न हों। यह माडल कोड आफ कण्डक्ट सभी पार्टियों के लिए बाध्यकारी हो। यदि ऐसा नहीं होगा तो जो पार्टी चुनावों के समय मुफ्त में ज्यादा रेवड़ी बाॅटने का वादा करेगी अथवा जो पार्टी ज्यादा तार्किक तरीके से आश्वासनों का झूँठा वितण्डा खड़ाकर प्रचार कर लेगी वह पार्टी सरकार बनाने में सक्षम हो जायेगी। झूँठे वादे करके सरकार बनाने वाली पार्टियाँ सरकार बनाने के बाद जनता के सरोकारों से पूरे कार्यकाल के दौरान या तो मुँह चुराती रहती हैं या फिर कुटिलता का परिचय देते हुए बकवास करती रहती हैं। यही कारण है कि आज विधायिकाएं जनता के प्रति असंवेदनशील हो गयी हैं। वर्तमान समय में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव लड़ने के आकांक्षी नेता अपने पार्टी के सुप्रीमो और हाइकमाण्ड की बंधुआ मजदूरी एवं बेगारी करने में अपने आत्म सम्मान को भी बेच देते हैं। यदि उपरोक्त वैज्ञानिक प्रक्रिया को भारतीय लोकतंत्र के चुनावी प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया तो कोई एक व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्ति ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बनने के सपने पर एकाधिकार नहीं जमाये रख सकेंगे। इसके अलावां अन्य निम्नलिखित परिवर्तन भारतीय राजनीति मंें परिलक्षित होंगे। (1) इस परिस्थिति में कोई भी विधायक अथवा सांसद प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनने का सपना देख सकेगा। राजनेता न केवल अपने निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं के बीच अधिक से अधिक जनप्रिय बनने के लिए रचनात्मक प्रयास करेंगे। बल्कि चुनावों के बाद प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद की अपनी प्रत्याशिता की सम्भावना को लेकर अन्य सांसदों अथवा विधायकों के वोट पाने के लिए राष्ट्रीय और प्रान्तीय समस्याओं के निराकरण के लिए व्यापक सोच के तहत रचनात्मक सहभागिता करेंगे। (2) इस परिवर्तित राजनीतिक व्यवस्था में न तो किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों तथा अल्पसंख्यकों की समस्याएं जनप्रतिनिधियों द्वारा इग्नोर की जा सकेंगी और न ही बच्चों, महिलाओं और युवाओं की सामाजिक समस्याओं के प्रति जनप्रतिनिधियों द्वारा तटस्थता बरती जा सकेगी। उपरोक्त सम्पूर्ण प्रक्रिया पार्टी विशेष के पूर्ण बहुमत पाने की स्थिति में तो लागू की ही जा सकती है। यह प्रक्रिया उस परिस्थिति में भी जबकि किसी पार्टी को लोकसभा अथवा विधानसभा के चुनावों में पूर्ण बहुमत ना मिला हो और कुछ पार्टियाँ आपस में मिलकर गठबन्धन की सरकार बनाना चाहते हों तब भी उपरोक्त फार्मूले के तहत सरकारों का गठन किया जा सकता है। यदि लोकसभा अथवा विधानसभाओं के चुनावों में ना तो एक पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया हो और ना ही किसी भी परिस्थति में राजनीतिक पार्टियाँ गबन्धन की सरकार बना पाने में सफल हो पा रही हों। ऐसी स्थिति में यदि केन्द्र सरकार के गठन की बात हो तो लोकसभा के सभी सांसद और यदि राज्यांे में सरकारों के गठन की बात हो तो विधानसभा विशेष के सभी विधायक पार्टी लाइन को तोड़कर उपरोक्त 10ः के फार्मूले के अनुसार ही क्रास पार्टी लाइन जाकर सरकार का गठन कर सकते हैं। वोटों की प्राप्ति को मिनिस्टर बनाने का भी आधार बनाया जाना चाहिए, इससे लगभग सभी राज्यों में प्रचलित जाति के आधार पर मिनिस्ट्री के गठन का आधार समाप्त हो जायेगा तथा मंत्रिमण्डल का गठन अत्यन्त वैज्ञानिक तरीके से और ठोस प्रक्रिया के तहत होने लगेगा। कुछ लोग यह कुतर्क कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री को मंत्रियों की अपनी टीम बनाने में स्वतंत्रता होनी चाहिए। उपरोक्त फार्मूले में प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों को अपनी टीम बनाने की पूरी स्वतंत्रता है लेकिन इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में मंत्रिमण्डल के चयन में स्वेच्छाचारिता एवं स्वछन्दता के लिए कोई स्थान नहीं है। वर्तमान समय में मन्त्रियों के चयन में प्रधानमंत्री अथवा सभी मुख्यमंत्री स्वेच्छाचारिता और स्वछन्दता की पराकाष्ठा को पार करते हुए मन्त्रिमण्डल का गठन करते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि कभी केजरीवाल के मंत्री फ्राड निकलते हैं तो कभी प्रधानमंत्री मोदी के। इस तरह की स्वेच्छाचारिता और स्वच्छन्दता के नमूने भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में केन्द्र से लेकर लगभग सभी राज्यों तक भरे पड़े हैं। भारतीय राजनीति में सामान्य तौर से यह परिलक्षित होता है कि राजनीतिक पार्टियों के सुप्रीमो और हाइकमाण्ड अपने-अपने पार्टी के सांसदों और विधायकों के साथ अक्सर अमर्यादित और शर्मनाक व्यवहार करते रहते हैं। ज्यादा बड़े चाटुकार सांसदों एवं विधायकों को सुप्रीमों मनमाने तरीके से मंत्रिमण्डल में ले लेते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि मंत्रिमण्डल में जगह पाने के लिए काम की जगह लाबिंग और चाटुकारिता का ही कुचक्र चलता रहता है। कुछ लोग यह भी कुतर्क कर सकते हैं कि सम्बन्धित निर्वाचन क्षेत्र से अधिक से अधिक वोट पाना प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा मंत्री पद पाने की योग्यता नहीं हो सकती है। इससे हो सकता है कि कोई सांसद अथवा विधायक अपने क्षेत्र में धनबल, बाहुबल अथवा अन्य किसी क्षेत्रीय प्रभाव एवं सरोकार के कारण वोटर का धु्रवीकरण करके अत्यधिक वोट पाय जाय तो क्या वह इन पदों के लायक हो जायेगा? लेकिन मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि उपरोक्त प्रक्रिया में ऐसी आशंका की सम्भावना बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि सांसदों अथवा विधायकों का अधिक से अधिक वोट पाना प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद पाने की केवल एकमात्र अर्हता नहीं है। तथ्य यह है कि आम चुनावों में अधिक से अधिक वोट पाना पी0एम0 और सी0एम0 पद के प्रत्याशिता की अर्हता मात्र है इसके बाद सांसदों अथवा विधायकों द्वारा एक ही बैठक में दो बार वोटिंग के फिल्ट्रेशन द्वारा ही प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री चुना जा सकेगा। मान लीजिए पहले चक्र में सांसद अथवा विधायक 10ः अधिकतम वोट पाये सांसदों अथवा विधायकों के लिए किसी वाद से वशीभूत होकर घटिया प्रत्याशी के पक्ष में ज्यादा वोट दे दें तो 10ः पहली बार की वोटिंग में अधिकतम वोट पाने वाले प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों के लिए पुनः उसी समय और उसी सभा में तत्काल दूसरे चक्र की वोटिंग होने के कारण अब घटिया स्तर का कोई सांसद अथवा विधायक प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद नहीं पा सकेगा। भारत के बुद्धिजीवियों को यह सोचना होगा कि भारतीय लोकतंत्र के नवनिर्माण में किस तरह की प्रवृत्तियाँ बाधक बन रही हैं और किस तरह से इन अवांछित प्रवृत्तियों से भारतीय लोकतंत्र को बचाया जा सकता है? अतः हमें आज की परिस्थिति में जब राजनीतिक पार्टियाँ व्यक्तिकेन्द्रित और पदलोलुप सुप्रीमांे एवं हाइकमाण्ड के गिरोह के रूप में दिखाई पड़ने लगी है। उस परिस्थिति में यदि व्यक्तिवादी राजनीति से छुटकारा पाने के तत्काल प्रभावी उपाय नहीं किये गये तो वह दिन दूर नहीं जब राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष पर बैठे लोग शासन और सत्ता प्राप्ति के लिए एक दूसरे की हत्या कराना शुरू कर देंगे। यह कोई नई बात तो है नहीं, आज भी विश्व के सैकड़ों देशो में सत्ता संघर्ष में हत्यायें होती रहती हैं। इसलिए भारतीय राजनीति के लिए सबसे घातक तत्व सुप्रीमो तथा हाइकमाण्ड जैसी अवांछनीय, अलोकतांत्रिक एवं असामाजिक बुराई हैं। वे सभी राजनीतिक पार्टियाँ जिनके अध्यक्ष राजनीतिक पार्टियों को अपनी बपौती मानकर संगठन के शीर्ष पर दशकों से बैठे हैं या फिर राजतंत्रीय कुरीतियों को पोषित करने वाले सुप्रीमो के निधन होने के बाद इनके वारिश अपने पूर्वजों की पार्टियों में नये सुप्रीमों के रूप में राजकुमारों की तरह राजतिलक करा लेते हैं। उपरोक्त वैज्ञानिक फार्मूले को अपनाकर ऐसे अवांछित और अलोकतंात्रिक तत्व भारतीय राजनीति से हमेशा के लिए अप्रासंगिक हो जायेंगे। सुप्रीमो जैसे इसी दुर्गुण के कारण भारतीय राजनीति में काले धन का साम्राज्य फल-फूल रहा है। काले धन की पोटली में बैठे सुप्रीमो नामक इन राजनीतिक धनपशुओं के कारण सामान्य आदमी चुनाव लड़ने में अपने आपको असमर्थ पा रहे हैं। इसी तरह से सालों-साल राजनीतिक पार्टियों के एक ही व्यक्ति अथवा उसके परिवार के नेतृत्व में रहने के कारण ठेकेदारों, अपराधियों, अधिकारियों और सुप्रीमो के बीच एन-केन-प्रकारेण देश अथवा प्रदेश के संसाधनों को लूटने का दुष्चक्र डेवलप हो जाता है। केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश की सरकारों में सामान्य तौर से उन्हीं को मंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है जो सुप्रीमो अथवा हाइकमाण्ड की चाटुकारिता अथवा अन्य प्रकार से उनसे निजता स्थापित कर लेता हो। मंत्री बनने के बाद सांसद अथवा विधायक किसी भी गलत-सही कार्य को आँख मूॅदकर यस बाॅस की भावना के साथ सुप्रीमो के हाँ में हाँ मिलाकर असामाजिक कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि आज चाहे केन्द्र की सरकार अथवा किसी प्रान्त की सरकार हो, सुप्रीमो की भावना को आप्त बचन मानकर विधायक, सांसद और मंत्री गुलामों की तरह हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं। वर्तमान परिस्थिति में मंत्रियों का सुप्रीमो अथवा हाइकमाण्ड से असहमति का सीधे से मतलब मंत्रीमण्डल से निष्कासन है। यदि मंत्रिमण्डल के गठन में चुनावों में प्राप्त वोटों को आधार बनाया गया तो मंत्रियों के बीच असहमति को भी सम्मानजनक स्थान मिल सकेगा। इससे स्वस्थ और प्रगतिशील लोकतंत्र बनेगा। सुप्रीमो कल्चर एक तरह से राजनीतिक पार्टियों के अन्दर पनप चुकी डिक्टेटरशिप है। जो कि लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। सुप्रीमो और हाइकमाण्ड की समस्या के निराकरण के लिए और मंत्रिमण्डल को इनके मकड़जाल से मुक्त करने के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपरोक्त लोकतांत्रिक विधि द्वारा प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री के चुनाव के बाद मंत्रिमण्डल का गठन सांसदों अथवा विधायकों द्वारा चुनावों में प्राप्त मतों के अनुसार निर्धारित होना चाहिए। यदि किसी प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को यह लगता है कि वोटो की प्राप्ति के आधार पर मंत्रियों के चुनाव होने से मेरे मनपशंद सांसदों अथवा विधायकों को मंत्रिमण्डल में जगह नहीं मिल पा रही है तो अपवाद स्वरूप अधिक से अधिक 10ः मंत्रिमण्डल सदस्य आम चुनावों में प्राप्त वोटो के आधार को तोड़कर बनाये जा सकते हैं। यदि इस प्रक्रिया के अनुसार मंत्रिमण्डल का गठन होने लगे तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वर्तमान परिस्थिति में जो सांसद और विधायक 2-3 जातियों के दुष्चक्र को बनाकर चुनाव जीत जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद जिन जातियों के वोट के दम पर उन्होंने चुनाव जीता है उन्हीं जातियों के लोगों के हितार्थ वह सांसद अथवा विधायक कार्य करने में अपने पूरे कार्यकाल के दौरान लगा रहता है तथा अपने सम्पूर्ण कार्यकाल के दौरान अन्य जातियों और वर्गों को वह तिरस्कृत करता रहता है। इस पक्षपात से भी आम जनता बच जायेगी। सांसद अथवा विधायक यह स्पष्ट रूप से जान रहा होता है कि सम्बन्धित पार्टी में एक स्तर से ज्यादा मुझे कोई भी पद नहीं मिलेगा क्योंकि सबसे ऊपर सुप्रीमो नामक मठाधीश बैठा है और कोई भी मंत्री सुप्रीमो के प्रसादपर्यन्त ही अपने पद पर बना रह सकता है। उपरोक्त प्रक्रिया द्वारा भारत की राजनीति से मध्यावधि चुनाव का दुर्गण हमेशा के लिए गायब हो जायेगा क्योंकि चुनाव हो जाने के बाद उपरोक्त फार्मूले के तहत किसी भी परिस्थिति में सरकारों का गठन सुनिश्चित हो सकेगा। यदि प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को अविश्वास प्रस्ताव द्वारा हटा दिया जाता है तो उस परिस्थिति में भी उपरोक्त विधि द्वारा पुनः सरकारों का गठन किया जा सकेगा। अतः किसी भी परिस्थिति में मध्यावधि चुनाव की सम्भावना हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी। चुनावों में प्राप्त वोटों के आधार पर बिना किसी चाटुकारिता के सांसदों और विधायकों को मंत्रिमण्डल में जगह सुनिश्चित हो सकेगी। इससे मंत्रिमण्डल में असहमतियों के स्वर पुनः जीवित हो सकेंगे। परिणाम स्वरूप स्वस्थ, रचनात्मक एवं प्रगतिशील लोकतंत्र के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा। वर्तमान समय में केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक यदि पार्टी विशेष की सरकार नहीं बनी तो हार्स ट्रेडिंग का नंगा नाच शुरू हो जाता है। यहाँ भी ब्लैकमनी, धनबल और बाहुबल के द्वारा सांसदांे अथवा विधायकों को तोड़ने का अलोकतांत्रिक व कुत्सित प्रयास शुरू हो जाता है। सांसदों और विधायकों की भेड़ बकरियों की तरह खरीद-फरोख्त होने लगती है। उपरोक्त विधि द्वारा भारतीय लोकतंत्र को इस दुर्गुण से भी सदैव के लिए निजात मिल जायेगी। आज पूरे देश में सांसद और विधायक का चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियाँ एवं उनके प्रत्याशी तरह-तरह के गलत हथकण्डे को अपनाकर लोकतंत्र की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं। ऐसा लगता है कि जनप्रतिनिधियों का परम साध्य एन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतना मात्र ही रह गया है। यदि उपरोक्त वैज्ञानिक विधि द्वारा पी0एम0, सी0एम0 और मिनिस्टर बनने लगें तो जनप्रतिनिधि अपनी इमेज के प्रति भी सचेष्ट रहेंगे। सांसदों और विधायकों द्वारा अपनी व्यक्तिगत इमेज के प्रति सचेष्ट होने कारण सांम्प्रदायिक दंगे नहीं होंगे और घृणित जातिवादी दुष्चक्र से भी भारतीय लोकतंत्र को हमेशा के लिए मुक्ति मिल जायेगी। आज कोई भी राजनीतिक पार्टी अथवा नेता संस्थागत सुधारों और नीतिगत बदलावों की बात नहीं करता है। अतः यदि उपरोक्त वैज्ञानिक विधि का राजनीतिक पार्टियों एवं जनता ने लागू कराने में पी0एम0आई0 का सहयोग दिया तो मूल्यपरक राजनीति करना राजनेताओं की मजबूरी बन जायेगी। ऐसी परिस्थति में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद अथवा अन्य तरह की चुनावी टैक्टिक्स को अपनाकर चुनाव जीतना सम्भव और अप्रसांगिक हो जायेगा।